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समय है समझ जाओ दोस्त

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अक्सर समझ और समय दोनों एक साथ  नहीं आते है  जब समय होता है तो समझ नहीं आता है  जब समझ आता है तो समय निकल जाता है. इधर जाऊ या उधार जाऊ  है कशमकश किधर जाऊ  गर भर गया हो मन तेरी मुझे से  दें इजाज़त मूझे की अब मैं मर जाऊ.  मैंने देखें है सुलगते अंगारे कई  पर तेज हवओ ने उनको टिकने ना दिया  लगे रही थी बोली मेरी भी जज्बातों की मंडी मे  पर मेरे हालातों ने मूझे बिकने ना दिया.

बहुत हुआ रोना धोना। बस अब और रोना नही।।

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बहूत हुआ रोना धोना !  बस अब और रोना नहीं !! जो पाया है तुममे अब तक !  नए के चक्कर मे खोना नहीं !! बहूत ले ली नींद आराम की ! बस अब और सोना नहीं !! काटो फसल पुरानी पहले !  बीज नए अभी बोना नहीं !! भीतर झाको और ततौलौ ! यदि मैला हो मन तुम्हारा !! केवल वस्त्रों को धोना नहीं !!! स्वंय पहचानों सीमा झुकने की ! कायर अपनी नजरों मे होना नहीं !! बहूत हुआ रोना धोना !  बस अब और रोना नहीं !! माया आनी जानी है ! इस के चक्कर मे सगे संबन्धी खोना नहीं !! मन एक खेत तुम्हारा बंधु !  इसमें बीज दुवेष के बौना नहीं !! जो दे वक्त बुरे मे साथ तुम्हारा !  उसको धोखा देना नहीं !! बहूत हुआ रोना धोना !  बस अब और रोना नहीं !!                        (विक्रम गोस्वामी)