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Showing posts from May, 2022

"शंकराचार्य का जीवन दर्शन"

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"शंकराचार्य का जीवन दर्शन"                               सनातन पर आए खतरे को देख हाथ मे दण्ड लिए पूरे देश का भ्रमण कर चार पीठों की स्थापना करने वाले आदि गुरु शंकराचार्य जी का धर्म के प्रति समर्पण ही सनातनधर्मियों को ऊर्जा प्रदान करता है। संत परम्परा के महान संत आदि गुरु शंकराचार्य जी को भगवान महादेव का अवतार माना जाता है। ऐसे समय उनका प्रादुर्भाव हुआ जब मठ मन्दिर व्यभिचार के केन्द्र बनाते जा रहे थे। धार्मिक क्षेत्रों से सदाचार लुप्त होता जा रहा था। नर बलि, पशु बलि, अंधविश्वास चर्म पर था। सन् 788 मे ग्राम कालडी केरल मे शिवगुरू व आर्यम्बिका के घर हुआ। तीन वर्ष की अवस्था होते होते उनके पति का देहावसान हो गया। तमिलियन होते हुए उन्होने संस्कृत व गणित मे महारत हासिल की वेदों,धर्म ग्रंथों का ज्ञान अर्जित किया मात्र 2 वर्ष की आयु मे गीता, रामायण, वेदों का कंठस्थ होना धार्मिक उपदेश देना व 8 वर्ष  की आयु मे वैराग्य लेना किसी दैवीय शक्ति से कम नही था। जब वहा भ्रमण के लिए निकले तो थक के एक वृक्ष के...

"क्रोध और विरोध जरूरी है"

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"क्रोध और विरोध जरूरी है" पितामह भीष्म जब भूलोक का कालचक्र पूरा कर स्वर्ग पहुँचे, अपना स्थान जटायु से नीचे देख अपने स्वभाव के अनुरूप पितामह क्रोधित हो गए और चित्रगुप्त जी से बोले मैं गंगापुत्र भीष्म, भगवान परशुराम का शिष्य, अटल प्रतिज्ञा का उद्घोषक, महारथियों का पितामह आपने मेरा स्थान एक मांस भक्षी पक्षी के नीचे रखा है। चित्रगुप्त जी मुस्कुराते हुए बोले, पितामह  जानता हूँ कि आप पराक्रमी, बुद्धिमान, व प्रतिज्ञा का पालन करने वाले हो। परंतु आप उस समय मौन व तटस्थ रहे जब आप को  विरोध करना चाहिये था। पांचाली का चीर हरण हो रहा था तब आपको क्रोध नहीं आया आप जैसा महापराक्रमी, ज्ञानी एक नारी के चीरहरण पर मौन रहा।  लेकिन जब माता सीता का हरण कर रावण ले जा रहा था, तो ये कमजोर पक्षी एक नारी के सम्मान के लिए शक्तिशाली, मायावी रावण से भीड़ गया और लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हुआ। जटायु ने समय पर क्रोध किया और गंगापुत्र आप समय पर विरोध भी न कर सके। इसलिए जटायु का स्थान आपके स्थान से ऊँचा हो गया। शिक्षा: देश,धर्म, व समाज और स्वाभिमान का जब कोई चीर हरण की कोशिश करें तो क्रोध स्वाभा...

द्वितीय अध्याय – ‘सांख्य योग’ (ज्ञानयोग)

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संसार की सभी समस्याओं का समाधान है : श्रीमतभगवत गीता  द्वितीय अध्याय – ‘सांख्य योग’ (ज्ञानयोग)  जब अर्जुन ने योद्ध करने से माना कर दिया तब भगवान कृष्ण ने अर्जुन से कहा हे अर्जुन तुम किस प्रकार की बात कर रहे हो ऐसी बात तुम जैसे महान योद्धा को शोभा नहीं देती है। अपने मन की कमजोरी को त्याग कर योद्ध के लिए तैयार हो जाओ। परंतु अर्जुन बोले वो कैसे अपने गुरु द्रोणाचार्य व पितामह पर धनुष चला सकते है वे तो सदा से उनके लिए पूजनीय रहे है। इन्हें मार कर मिली जीत में भी मेरी हार है। मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा है मेरा मार्गदर्शन करो कृष्ण।  भगवान मुस्कुराते हुई अर्जुन की ओर देखते है और फिर शुरू होता है  गीता का वो ज्ञान जो संसार के सभी मनुष्यों को ध्यान से सुनना चाहिए। भगवान श्री कृष्ण बोले अर्जुन आखिर तुझे हुआ क्या है तेरे जैसे व्यक्ति को किसी की मृत्यू से नहीं डरना चाहिये। तुझे क्या लगता है ये लोग तेरे मारने से मर जाएंगे। ये सभी लोग व तुम भी इस जन्म से पूर्व भी थे और अगला जन्म भी होगा। अधूरे ज्ञान के चलते तुम दुखी हो रहे हो। तुम तो केवल माध्यम हो इनको मारने ...