धर्म
धर्म समय के साथ-साथ जब लोग बदलने लगे तो समझ लो आप का समय भी बदल रहा है और बदलाव ही प्रकृति का नियम भी है। प्रकृति से सीखना चाहियें। वसंत ऋतु मे पेड़ पौधे, बाग बगीचे, खेत खलियान हरे भरे होते है वहीं शरद ऋतु मे हरे भरे पेड़ भी अपने पत्तों को स्वयं ही अपने से दूर कर देते है। क्योंकि नया तब तक संभव नहीं है जब तक पुराने से मोह भंग ना हो। इसमे मैं किसी को छोड़ने के विषय मे बात नहीं कर रहा हूँ क्योंकि जिसे आपने सही से पकड़ा ही नहीं है उसे छोड़ा कैसे जा सकता हैं। कहीं ऐसा तो नहीं की आप अपनी सुविधा के अनुसार किसी को अपना बनाते हो और छोड़ते हो। ये कथन किसी एक व्यक्ति या समूह के लिए नहीं अपितु समस्त सांसारिक प्राणियों के लिए है। धर्म, समाज, रिश्ते, सभी हमारी सुविधा के अनुसार ही होते है। क्या हम पूर्णरूप से धर्म के नियमों के अनुसार चलते हैं, क्या हम सही से अपने सामाजिक कार्य कर पा रहे हैं? क्या हम अपने रिश्तों के साथ पूरी तरहा न्याय कर पा रहे हैं? अगर नहीं तो जान लो धर्म समाज और रिश्ते के संचालक आप हो। आप धर्म और समाज के अनुसार नहीं बल्कि आप अपने अनुसार सभी को चलाते हो वो भी...