धर्मराज युधिष्ठिर

धर्मराज युधिष्ठिर


धर्म की स्थापना के लिए महाभारत जैसा भीषण विध्वंस कारी युद्ध हुआ। जिसमें सभी पात्र किसी ना किसी देव या  महा ऋषि की संतान थे, एक से बढ़कर एक पात्र थे। कोई योद्धा तो कोई ज्ञानी सभी अपने अपने क्षेत्र में परिपूर्ण और परिपक्व थे। 


ऐसा ही एक पात्र जो धर्म का अंश था बेहद सदाचारी, गंभीर, धैर्यवान नीति निपुण, सत्यवादी, विनयशील, धार्मिक प्रवृत्ति के धनी पांडू के जेष्ठ पुत्र धर्मराज युधिष्ठिर थे। उन्होंने गुरु द्रोण से भाला चलाने की शिक्षा प्राप्त की जिसमें वह पूर्ण रूप से निपुण थे। वह सदैव सत्य बोलते थे व सभी को समान रूप से प्रेम करते थे कौरव और पांडवों में किसी भी प्रकार का कोई भेद नहीं रखते थे। युधिष्ठिर आज्ञाकारी थे वह अपने सभी बड़ों का सम्मान करते थे,


युवराज पद मिलने के उपरांत इन्होंने प्रजा हित में दृढ़ता सहनशीलता,दयालुता,विनम्रता से कार्य किया जिससे प्रजा में उनके प्रति सम्मान की भावना थी। जो दुर्योधन और उसके मामा शकुनि को विचलित कर रहा था। युधिष्ठिर के प्रति प्रजा में बढ़ते सम्मान से दुर्योधन को भविष्य में राज्य पाठ ना मिलने का भय सता रहा था इसलिये शकुनी और दुर्योधन द्वारा षड्यंत्र रचकर पाण्डवों को वर्णावत भेज दिया गया। जहां उन्हें लाख से बने भवन में जलाकर मारने का प्रयास किया गया, परंतु वह बच गए।

युधिष्ठिर बेहद संतोषी प्रवृत्ति के व्यक्ति थे वहां विवाद से दूर रहना चाहते थे वह नहीं चाहते थे कि किसी भी प्रकार से कौरव और पांडवों के बीच कोई वैमनस्य पैदा हो यही कारण था कि वह दुर्योधन और दुशासन की गलतियों को माफ कर देते थे व अपने भाइयों को समझा कर शांत कर देते थे।


यक्ष द्वारा जब युधिष्ठिर अनुजों को मृत्यु दी गई तब युधिष्ठिर ने अपने बुद्धि विवेक से दक्ष के सभी प्रश्नों का जवाब देकर अपने चारों भाईयों को पुनर्जीवित कराया।


धर्मराज युधिष्ठिर द्वारा की गई एक ऐसी गलती जो उनके व्यक्तित्व पर प्रश्नवाचक चिन्ह लगाती है एक सदाचारी व्यक्ति आखिर कैसे इतनी बड़ी गलती कर सकता है द्यूत क्रीड़ा मे अपनी सभी सम्पदा के साथ साथ अपने भाईयों, अस्त्र शस्त्र और पत्नी को दाब पर लगा सकता है। ये गलती साधारण नहीं थी, इसके चलते ही भरी सभा मे पांचाली ही नहीं बल्कि समूची नारी जाति का अपमान हुआ है, इस घटना के बाद ही महाभारत का होना तय हुआ। चीरहरण के उपरांत जब भीम सिंह गर्जना मे प्रतिज्ञा ले रहे थे व अपने आक्रोश को प्रस्तुत कर रहे थे तब भी युधिष्ठर शांत व बेबस बैठे थे, उनके पास द्रौपदी के किसी सवाल का जवाब नहीं था। 

इतिहास इनकी इस गलती को कभी क्षमा नहीं करेगा।



 बचपन से ही भीम युधिष्ठिर के साथ अंगरक्षक के रूप में उनकी रक्षा के लिए रहते थे, 18 दिनों तक चले युद्ध में भी भीम नहीं कभी युधिष्ठिर का साथ नहीं छोड़ा साए की तरह उनके साथ ही रहते थे, युधिष्ठिर की आधी अधूरी बात सुनकर गुरु द्रोणाचार्य ने अपने शस्त्र रख दिए जिसके बाद धृष्टद्युम्न ने उनका वध कर दिया। इनके इसी कथन के कारण जीत का मार्ग प्रशस्त हुआ, गुरु द्रोण के रहते पांडव कभी भी इस युद्ध को नहीं जीत सकते थे। युद्ध के सतरवें के दिन युधिष्ठिर ने अपने मामा शल्य को भले की नोक से  यमलोक पहुंचा दिया। युद्ध विजय के उपरांत युधिष्ठिर  हस्तिनापुर के सम्राट हुए। 


जब पाण्डवों को सूचना मिली भगवान श्रीकृष्ण ने अपने अलौकिक शरीर का त्याग कर दिया है। तब वे सभी विचलित हो उठे। युधिष्ठिर ने अपने राज पाट को अभिमन्यु पुत्र परीक्षित को सौंप दिया। तत्पश्चात पांचों भाई द्रौपदी सहित सशरीर स्वर्ग यात्रा पर निकल गए। केवल युधिष्ठिर ही सशरीर  स्वर्ग पहुंच पाए। बाकी सभी ने रास्ते मे ही शरीर त्याग दिया था। 


विक्रम गोस्वामी


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