"दिल्ली का राजनैतिक इतिहास"
भारत की आजादी के बाद देश मे राजनैतिक सरगर्मी बढ़ गई थी.
आजादी के बाद दिल्ली को पार्ट-सी स्टेट का दर्जा दिया गया था। दिल्ली मे लम्बे समय तक नगरपालिका प्रशासन मे रही। वो ही सरकार की भूमिका मे थी। चीफ कमीशनर इसके सर्वेसर्वा होते थे।
नगरपालिका के अन्तर्गत 7 मार्च 1952 मे दिल्ली विधानसभा निर्वाचित हुई। मंत्रिपरिषद का नेतृत्व चौधरी ब्रह्म प्रकाश ने किया। इस तरह चौधरी ब्रह्म प्रकाश दिल्ली के पहले मुख्यमंत्री हुए। ब्रह्म प्रकाश दिल्ली के शकूरपुर गावं के निवासी थे। उस समय विधानसभा के सदस्यों की कुल संख्या 48 थी।
सन 1955 मे दिल्ली के मुख्यमंत्री के रूप मे गुरुमुख निहाल सिह को नियुक्त किया गया। एक साल बाद ही दिल्ली की विधानसभा की व्यवस्था को समाप्त कर दिया गया और नवंबर 1956 मे दिल्ली को पावर सी स्टेट का दर्जा मिल गया।
जिससे दिल्ली राष्ट्रपति के शासन के दायरे मे आ गई। और फिर राज्य पुनर्गठन की सिफारिशे आना शुरू हुई। सन 1957 मे म्यूनिसिपिल एक्ट बनाया गया। इसके आने के बाद दिल्ली मे मेट्रोपोलिटन काउंसिल बनी और लम्बे समय तक दिल्ली इस मेट्रोपोलिटन काउंसिल के अन्तर्गत ही चली। इस काउंसिल के पास कोई विधि निर्माण का अधिकार नही था। मेट्रोपोलिटन काउंसिल को ही भंग कर के दिल्ली विधानसभा बनी थी।
24 दिसम्बर 1987 मे भारत सरकार ने सरकारिया कमेटी बनाई जिसे बालकृष्ण कमेटी भी कहा जाता है।
14 दिसंबर 1989 को अपनी रिपोर्ट सरकार को सौपी।
सांसद द्वारा संविधान मे 69वाँ संशोधन किया गया। आर्टिकल 239AA व 239AB को संविधान मे जोड़ा गया।
इस के उपरांत ही दिल्ली मे अगल विधानसभा का निर्माण हुआ। राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र अधिनियम 1991 को संसद ने पास किया। दिल्ली मे कुल विधानसभा के सदस्यों की संख्या 70 रखी गई.
दिल्ली मे पहला विधानसभा चुनाव 1993 मे हुआ। जिसमें भारतीय जनता पार्टी ने 49 सदस्यों ने जीत दर्ज कराई.
मदन लाल खुराना मुख्यमंत्री बने. 1993 से 1996 तक मुख्यमंत्री रहे। भाजपा के ही नेता साहब सिह वर्मा को पार्टी ने मुख्यमंत्री बना दिया। (1996 से 1998) 13 अक्टूबर 1998 से 3 दिसम्बर तक सुषमा स्वराज दिल्ली की प्रथम महिला मुख्यमंत्री रही।
सन 1998 के चुनाव मे भारतीय जनता पार्टी की हार हुई भाजपा केवल 15 सीट मे निमट गई को वही कोंग्रेस ने 52 सीट जीत कर सरकार बना ली.
कांग्रेस की तरफ से शीला दीक्षित मुख्यमंत्री बनी
सन 2003 के चुनाव भी कोंग्रेस के खाते मे गया और फिर से शीला दीक्षित मुख्यमंत्री बनी भाजपा को केवल 20 सीट से सन्तोष करना पड़ा।
सन 2008 मे भाजपा केवल 23 सीट और शीला दीक्षित के नेतृत्व वाली कोंग्रेस को 43 सीट मिलीं।
शीला दीक्षित लगातर तीन बार विधानसभा चुनाव जीत कर 15 वर्ष तक दिल्ली की मुख्यमंत्री रही.
2010 से 2012 तक दिल्ली मे कई आन्दोलन हुए। जिसमें प्रमुख थे रामदेव व अन्ना हजारे का आन्दोलन दिल्ली की जनता कोंग्रेस के खिलाफ मन बना रही थी। वर्ष 2013 मे हुए विधानसभा चुनाव मे एक नई राजनैतिक पार्टी मे भी भाग लिए जिसका नाम था आम आदमी पार्टी इस पार्टी का जन्म अन्ना हजारे के आन्दोलन से हुआ था। अरविन्द केजरीवाल इस के मुख्या है
2013 विधानसभा चुनाव के परिणाम ने दिल्ली की राजनीति बदल दी। भाजपा को 34 सीट मिलीं. कोंग्रेस को कुल 8 सीट ही मिल पाई। अरविन्द केजरीवाल के नेतृत्व वाली आम आदमी पार्टी को 28 सीट मिलीं।
2013 मे अरविन्द केजरीवाल कॉंग्रेस के समर्थन से दिल्ली के मुख्यमंत्री बने। ये सरकार कुछ ही दिनों बाद गिर गई।
वर्ष 2015 मे फिर से आम आदमी पार्टी को सत्ता चलने का अवसर जनता ने दिया। इस बार आम आदमी पार्टी के 67 विधायक जीते, भाजपा के केवल 3 विधायक ही जीत पाए, कॉंग्रेस का खता भी नही खुला।
वर्ष 2020 के विधानसभा चुनाव मे आप आदमी पार्टी को 62 सीट मिलीं। अरविन्द केजरीवाल लगतार तीसरी बार दिल्ली के मुख्यमंत्री बने। भाजपा को केवल 8 सीट ही मिल पाई। कॉंग्रेस इस बार भी अपने किसी भी प्रत्याशी को नही जीता पाई।
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