संन्यासी आन्दोलन
सन्यासी आंदोलन
धूल चढ़ी इतिहास की पुस्तकों में दफन है एक ऐसा आंदोलन जिस के विषय मे लोगों को अधिक नहीं बताया गया। अंग्रेजों की दमनकारी नीतियों के चलते शांत स्वभाव के सन्यासियों को भी विद्रोह का मार्ग अपनाना पड़ा। जब अंग्रेजों ने हिंदुओं को उनके तीर्थ स्थानों पर जाने पर प्रतिबंध लगा दिया था।
सन 1763-1800ई में गिरी संप्रदाय के सन्यासियों व नागा सन्यासियों द्वारा एक आंदोलन चलाया गया। ये सभी संन्यासी आदि गुरु शंकराचार्य के अनुयायि थे। इस आंदोलन में किसानों व शिल्पकारों ने भी भाग लिया। ये सभी संन्यासी शस्त्र और शास्त्र के ज्ञाता थे इनका मुख्य काम धर्म का प्रचार प्रसार व पठन पाठन व शस्त्रों का परीक्षण देना होता था। मठ मन्दिरों की देख रेख व पूरी व्यवस्था इन्हीं के हाथ मे होती थी। जीवित रहते हुए स्वयं का पिंडदान कर अपने आप को धर्म के प्रति समर्पित कर धर्म युद्ध मे अग्रणी भूमिका मे रहते थे। ये वेह योद्धा थे जिन्होने इस आंदोलन से पूर्व भी मराठाओ व राजपूतों के साथ मिल कर विदेशी आक्रांताओं से जंग लडी है।
वर्ष 1770 मे बंगाल मे भीषण अकाल पड़ा जिससें जनजीवन अस्तव्यस्त हो गया था। उस समय भी अंग्रेजों द्वारा कठोरता से लगान वसूला जा रहा था। इस निर्दयाता को देख सन्यासियों के साथ जमींदार भी जुड़ने लगे। दसनाम सम्प्रदाय के सन्यासियों ने एकजुट होकर धर्म और संस्कृति को बचाने के लिए शस्त्र युद्ध का बिगुल फुक दिया।
किस आंदोलन का नेतृत्व मोहन गिरि और भवानी पाठक कर रहे थे। बलपूर्वक सन्यासी अंग्रेजों को उनके कृत की सजा दे रहे थे। घात लगाकर अंग्रेजी कंपनियों पर धावा बोलते थे। बंगाल और बिहार में फैले इस विद्रोह मे संन्यासी योद्धा ‘ॐ बन्दे मातरम’ के नारे से सभी मे राष्ट्र प्रेम की ऊर्जा भरते थे। यह आंदोलन काफी लंबा चला इन्हीं सन्यासियों से प्रेरणा पाकर बहुत से प्रांतों में अंग्रेजो के खिलाफ छोटे-छोटे आंदोलन शुरू होने लगे जिसके फलस्वरूप अंग्रेजी हुकूमत इस आंदोलन को हर कीमत पर कुचलना चाहती थी।
वारेन हेस्टिंग्स ने बेरहमी से संन्यासियों और हिन्दुओ का कत्लेआम किया जिसके बात ये आन्दोलन दूसरे आन्दोलनों मे परिवर्तित हो गया।
इस आंदोलन का विस्तृत उल्लेख बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय के उपन्यास आनंद मठ में वर्णित है।
(विक्रम गोस्वमी)
जय जय कार।
ReplyDeleteRAM RAM JI
ReplyDeleteबहुत बढ़िया जी।
ReplyDeleteबात तो सही है
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