द्वितीय अध्याय – ‘सांख्य योग’ (ज्ञानयोग)

संसार की सभी समस्याओं का समाधान है : श्रीमतभगवत गीता 

द्वितीय अध्याय – ‘सांख्य योग’ (ज्ञानयोग) 
जब अर्जुन ने योद्ध करने से माना कर दिया तब भगवान कृष्ण ने अर्जुन से कहा हे अर्जुन तुम किस प्रकार की बात कर रहे हो ऐसी बात तुम जैसे महान योद्धा को शोभा नहीं देती है। अपने मन की कमजोरी को त्याग कर योद्ध के लिए तैयार हो जाओ।
परंतु अर्जुन बोले वो कैसे अपने गुरु द्रोणाचार्य व पितामह पर धनुष चला सकते है वे तो सदा से उनके लिए पूजनीय रहे है। इन्हें मार कर मिली जीत में भी मेरी हार है। मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा है मेरा मार्गदर्शन करो कृष्ण। 
भगवान मुस्कुराते हुई अर्जुन की ओर देखते है और फिर शुरू होता है  गीता का वो ज्ञान जो संसार के सभी मनुष्यों को ध्यान से सुनना चाहिए। भगवान श्री कृष्ण बोले अर्जुन आखिर तुझे हुआ क्या है तेरे जैसे व्यक्ति को किसी की मृत्यू से नहीं डरना चाहिये। तुझे क्या लगता है ये लोग तेरे मारने से मर जाएंगे। ये सभी लोग व तुम भी इस जन्म से पूर्व भी थे और अगला जन्म भी होगा। अधूरे ज्ञान के चलते तुम दुखी हो रहे हो। तुम तो केवल माध्यम हो इनको मारने वाला मैं हूँ। ये सभी मर कर भी मेरे की पास आएंगे। क्योंकि ये शरीर नहीं आत्मा है और आत्मा कोई मारा नहीं जा सकता है आत्मा तो केवल शरीर बदलती  है। तो तुझे इनकी मृत्यु का पाप कैसे लग सकता है। अर्जुन जन्म देने और मारने वाला मैं ही हूँ। क्या तू किसी मृत जीव को जीवित कर सकता है अगर मरे हुए को जीवन नहीं दे सकता है तो जीवित को भी नहीं मार सकता है। केवल इतना समझ ले इन सभी की मौत मैने तेरे ही हाथों से लिखी है। जिस क्षत्रिय को जीवन में धर्म के लिए योद्ध करने का अवसर मिलता है वो बहुत सौभाग्यशाली होता है क्योंकि उसका धर्म और कर्म यही है। अगर तू इस योद्ध में भाग नहीं लेगा तो तेरे नाम कलंकित होगा व कायर  कहलाया जाएगा। ये कलंक तेरी मौत से भी बड़ा है जो तुझे सम्मान दिया करते थे वो तेरी बुराई करेंगे व तेरी वीरता पर सवाल पर उठाएंगे। इस लिए अर्जुन तुम हर- जीत सुख- दुःख, लाभ और हानि को छोड़ युद्ध  के लिए धनुष उठा। जीता तो धरती पर सुख भोगना अगर मारा गया तब भी तू मेरी की शरण मे आएगा। तुम्हारा ज्ञान मेरे इस ज्ञान के आगे बहुत छोटा है तुम कर्म से पहले ही परिणाम के विषय में सोच रहे हो। जबकि फल देने वाला मैं हूँ। तुम अपना काम करो मैं अपना काम करूंगा। 
इस पर अर्जुन से भगवान कृष्ण से सवाल किया आपने मुझे अपने विचारों को स्थिर करने को कहा है ये में कैसे करूं। भगवान बोले  जो व्यक्ति अपने द्वारा किए जा रहे कार्य के फल के विषय में सोचना बंद कर देता है शुभ अशुभ मान अपमान से ऊपर उठ जाता है व मन की इच्छा पर नियंत्रण पा लेता है वह व्यक्ति स्थिर बुद्धि कहलाता है जब मन इच्छा पूरी नहीं होती है तो मनुष्य क्रोध से ग्रस्त हो जाता है और अपना आपा खो देता है। अपनी इच्छाओं को कच्छुए के समान अपने भीतर समेट लेना चाहिय।और केवल कर्म करना चाहिए। 

शिक्षा: 1.हमें धर्म संवत कार्य करना चाहिये जिससें हम भगवान को प्राप्त कर सके (मोक्ष प्राप्ति)
शिक्षा: 2. कर्म करना चाहिये परिणाम की चिंता नही करनी चाहिए।
शिक्षा: 3. इच्छाओं पर नियंत्रण होना चाहिए यदि इच्छा पूरी नही होती है तो अवसाद व क्रोध मे परिवर्तित हो जाती है।

विक्रम गोस्वामी
www.vikramgoswami.in

Comments

Popular posts from this blog

सादगी से मनाया जाएगा गुरु पूर्णिमा महोत्सव

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने महंत सुरेंद्रनाथ अवधूत को बनाया विश्व हिन्दु महासंघ का भारत का अं​तरिम अध्यक्ष

कांवड़ यात्रा में हिंदू नाम से दुकानें खोलना धोखा है, अपनी असली पहचान बताएं – महंत सुरेन्द्र नाथ अवधूत