माना है घनघोर अंधेरा,पर तू क्यों घबराता है।।

माना है घनघोर अंधेरा,
पर तू क्यों घबराता है।।

अमर नही है जग मे कोई,
जो जन्मा है वो एक दिन जाता है॥

तू तो है एक कटपुतली प्यारे,
डुगडुगी जीवन की विधाता ही बजाता है॥

कर्म करना है काम तेरा बस,
फल के लालच मे क्यों फस जाता है॥

तुझको नही विश्वास राम पर,
इसलिए कष्टों मे तू घिर जाता है॥

माना है घनघोर अंधेरा,
पर तू क्यों घबराता है।।

जो होना है वो हो कर ही रहेगा, 
फिर क्यो चिंता के सागर मे फंसता जाता है॥

जो मुठि बांधे आता है, 
वो हाथ पसारे जाता है॥

जो जानी नही है साथ तेरे,
ऐसी दौलत पर तू क्यों इतराता है॥

जो लिखी है तेरे खाते मे, 
उसे छीन कोई कहा पाता है॥

साँस की गिनती तय है प्यारे,
कोई अधिक नही ले पाता है॥

माना है घनघोर अंधेरा,
पर तू क्यों घबराता है॥ 

जिनका है संबंध राम से,
उसका बुरा कहा कोई कर पाता है॥ 

जो रखते है सदा धैर्य,
सुखद जीवन वही पाता है॥

चीर अंधेरे की छाती को, 
सूरज अम्बर मे छा जाता है॥

छोड़ दे वन्दे सब कुछ रव पर, 
वही जन्म और मृत्यु का दाता है॥
                         (विक्रम गोस्वामी)

Comments

  1. बहुत अच्छा जी।

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  2. आज के माहौल में कुछ भी सत्यापित नहीं। राम नाम भजने वाले नदियों में शव बन बह रहे हैं। ग़ज़ब लीला राम की। सुन्दर अभिव्यक्ति।

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  3. Badiya likha ho

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