"शंकराचार्य का जीवन दर्शन"

"शंकराचार्य का जीवन दर्शन"                             
 सनातन पर आए खतरे को देख हाथ मे दण्ड लिए पूरे देश का भ्रमण कर चार पीठों की स्थापना करने वाले आदि गुरु शंकराचार्य जी का धर्म के प्रति समर्पण ही सनातनधर्मियों को ऊर्जा प्रदान करता है। संत परम्परा के महान संत आदि गुरु शंकराचार्य जी को भगवान महादेव का अवतार माना जाता है। ऐसे समय उनका प्रादुर्भाव हुआ जब मठ मन्दिर व्यभिचार के केन्द्र बनाते जा रहे थे। धार्मिक क्षेत्रों से सदाचार लुप्त होता जा रहा था। नर बलि, पशु बलि, अंधविश्वास चर्म पर था। सन् 788 मे ग्राम कालडी केरल मे शिवगुरू व आर्यम्बिका के घर हुआ। तीन वर्ष की अवस्था होते होते उनके पति का देहावसान हो गया। तमिलियन होते हुए उन्होने संस्कृत व गणित मे महारत हासिल की वेदों,धर्म ग्रंथों का ज्ञान अर्जित किया मात्र 2 वर्ष की आयु मे गीता, रामायण, वेदों का कंठस्थ होना धार्मिक उपदेश देना व 8 वर्ष  की आयु मे वैराग्य लेना किसी दैवीय शक्ति से कम नही था। जब वहा भ्रमण के लिए निकले तो थक के एक वृक्ष के नीचे बेठ गाए। वही एक सांप अपने फन की छाया से एक मेंढ़क को गर्मी व धूप से बचा रहा है। ये देख उन्होने अपने दिव्य ज्ञान से जाना ये भूमि साधारण भूमि नही बल्कि शृंगी ऋषि जी का आश्रम है। उस ही दौरान नर्मदा नदी के किनारे उनकी मुलाकात आचार्य गोविंद भगवत्पाद से हुई। बाल अवस्था से शंकर नाम से पुकारे जाने वाले संन्यासी को उनके दिव्य ज्ञान को देख आचार्य गोविंद भगवत्पाद ने शंकराचार्य नाम दिया। एक समय चाण्डाल के स्पर्श से शंकराचार्य क्रोधित हो गए। इस पर व चाण्डाल मुस्कुराता हुआ बोला अगर आत्मा और परमात्मा एक है तो अपवित्र कौन हुआ। आप की आत्मा या परमात्मा या फिर देह का अभिमान। चाण्डाल के रूप मे भगवान महादेव ने उन्हें ब्रह्मा और आत्मा का पूर्ण ज्ञान दिया।
धर्म जागरण के लिए निकले शंकराचार्य जी को पग पग पर परीक्षा की कसौटी का सामना करना पड़ा। शास्त्रार्थ मे मण्डल मिश्र और उसकी पत्नी को पराजित किया। शंकराचार्य जी बहुत दूरदर्शी भी थे वे जानते थे केवल कर्मकांड और धर्म प्रचार भर से सनातन धर्म को सुरक्षित नही किया जा सकता है। इसके लिए धर्म रक्षक यौद्धाओं की भी जरूरत है। ये भांपते हुए उन्होने चार प्रमुख मठों 1.श्रृंगेरी मठ, 2.गोवर्धन मठ,3.शारदा मठ, 4.ज्योतिर्मठ, के साथ साथ अखाड़ों की भी स्थापना की जिसनें युवा साधुओं को समलित किया। अखाड़ों मे धार्मिक शिक्षा के साथ हथियार चलाने का प्रशिक्षण व योग, हटयोग भी सीखाया जाता है। सरल शब्दों मे अगर कहे तो मठ व संस्थान है जहां धर्मगुरु अपने शिष्यों को शिक्षा, उपदेश आदि देते हैं. मठ के प्रमुख को पीठाधीश्वर या मठाधीश कहा जाता है। मठों मे आध्यत्मिक शिक्षा, धार्मिक अनुष्ठान के अलावा सामाजिक सेवा, साहित्य आदि से संबंधित काम होते हैं। शंकराचार्य  हिन्दू धर्म का सर्वोच्च पद है। इस पद की नियुक्ति की प्रक्रिया बहुत ही कठिन होती है दशनामी अखाड़े के प्रमुख, अखाड़ों के आचार्य महामंडलेश्वर और स्थापित संतों की सहमति के बाद शंकराचार्य का चयन होगा। शंकराचार्य जी ने मठ का निर्माण किया धर्म का प्रचार प्रसार के लिए व अखाड़ों का निर्माण किया धर्म रक्षा के लिए उनकी नीतियों का अनुसार हिन्दू धर्म मे कम होने लगा। जबकि सिख धर्म उनकी नीतियों को अपना कर फल फूल रहा है। सिख धर्म को संचालित करने के लिए दो प्रमुख जाथे होते है। एक जथा ग्रंथियाँ का है जो प्रचार करता है। एक जथा निहंग सिखों का है जो धर्म की रक्षा के लिए बनाया था। शंकराचार्य जी का समूचा जीवन सनातन धर्म को समर्पित रहा उनके जीवन परिचय को पढ़ने से धर्म के प्रति अपने कर्तव्य का बोध होता है 
आदि गुरु शंकराचार्य की महासमाधि 820 ई. में केदारनाथ हुई।
विक्रम गोस्वामी
www.vikramgoswami.in

Comments

  1. Jai ho sanatan dharam ki jai 🚩🚩🚩🙏🙏

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    1. Jay shree ram 🙏

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    2. प्लीज कांटेक्ट नंबर

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    3. 7055811317 this is my no

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    4. ओम नमो नारायण जी🙏🙏🙏

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  2. जय हो

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  3. ओम नमो नारायण जी

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