Posts

समय है समझ जाओ दोस्त

Image
अक्सर समझ और समय दोनों एक साथ  नहीं आते है  जब समय होता है तो समझ नहीं आता है  जब समझ आता है तो समय निकल जाता है. इधर जाऊ या उधार जाऊ  है कशमकश किधर जाऊ  गर भर गया हो मन तेरी मुझे से  दें इजाज़त मूझे की अब मैं मर जाऊ.  मैंने देखें है सुलगते अंगारे कई  पर तेज हवओ ने उनको टिकने ना दिया  लगे रही थी बोली मेरी भी जज्बातों की मंडी मे  पर मेरे हालातों ने मूझे बिकने ना दिया.

बहुत हुआ रोना धोना। बस अब और रोना नही।।

Image
बहूत हुआ रोना धोना !  बस अब और रोना नहीं !! जो पाया है तुममे अब तक !  नए के चक्कर मे खोना नहीं !! बहूत ले ली नींद आराम की ! बस अब और सोना नहीं !! काटो फसल पुरानी पहले !  बीज नए अभी बोना नहीं !! भीतर झाको और ततौलौ ! यदि मैला हो मन तुम्हारा !! केवल वस्त्रों को धोना नहीं !!! स्वंय पहचानों सीमा झुकने की ! कायर अपनी नजरों मे होना नहीं !! बहूत हुआ रोना धोना !  बस अब और रोना नहीं !! माया आनी जानी है ! इस के चक्कर मे सगे संबन्धी खोना नहीं !! मन एक खेत तुम्हारा बंधु !  इसमें बीज दुवेष के बौना नहीं !! जो दे वक्त बुरे मे साथ तुम्हारा !  उसको धोखा देना नहीं !! बहूत हुआ रोना धोना !  बस अब और रोना नहीं !!                        (विक्रम गोस्वामी)     

अनुभव अच्छा और बुरा

Image
हर समस्या पिछली समस्या से बड़ी क्यों लगती है|  केवल इस लिए चूंकि हम हर बुरे वक़्त और बुरी बात को बहूत जल्द भूल जाना चाहते है. हमें लगता है इस समस्या से पार पाने के बाद हमारे जीवन मे कोई और समस्या नहीं आएगी केवल इस पर विजय पानी है   जब हम समस्या को परास्त कर देतें है तब हम स्वंय की पीठ थपथपाते है और स्वंय को अधिक श्रेय देतें है और यदि विफल हो जाते है तो दूसरों पे फैल होने का ठीकरा फोड़ा जाता है खैर विषय समस्या का सरूप है तो उस ही पर लौटे चलते है जैसे जीवन की हर बड़ी से बड़ी उपलब्धि का उल्हास भी कुछ समय के बाद कम हो जाता है और थोड़ा अधिक समय हो जाने के बाद समाप्त हो जाता है. उस ही प्रकार समस्या भी एक समय के बाद छोटी लगने लगती है जैसे जब हम कक्षा 7 की परीक्षा देने की तयारी करते है तब बहूत मुश्किल होती है और सही से पढ़ने के बाद जब हम उतीर्ण होते है सफलता का सुखद अनुभव करते है फिर कक्षा 8 ,9,10,11के बाद कक्षा 7 के सभी प्रश्न बहूत सरल लगते है जो किसी समय बहूत कठिन थी. तब हम उस योग्य बन जाते है की कक्षा 7 के विद्यार्थी को पढ़ व समझा सके. ये पुराना दस्तूर रहा है ...

परिचय

Image
मैं विक्रम गोस्वामी दिल्ली में रहता हूँ! दिल्ली मतलब भारत का दिल,  दिल में जगह मिल जाए इस से बड़ी बात क्या होगी! पर बात तो तब बनेगी जब लोगो के दिलो में जगह मिले,  हर व्यक्ति चाहता तो यही है पर जो प्रयास करता है बही दिलो में जगह बना पाता है  आज अधिकांश लोग बिना चले पहुँचना और बिना करें पाना चाहते है जो की संभव नहीं है! खुलीं आँखो से सपने देखना बहूत आसान है पर उनको पूरा करने के लिए स्वंय को तपाना पड़ता है ये बात कोई नई नहीं है ऐसा भी नहीं की आप और मैं इस बात को जानते नहीं पर संघर्ष की कसौटी पर स्वयं कसना कौन चाहता है.  मैंने हर बार चलना प्रारम्भ किया पर कुछ समय बाद अपने आप को वही पाया जहा से चलना शुरू किया था। अब चलते हुए समय अधिक हो गया है पर मैं वही का वही हूँ. पैर उठा कर नीचे रखने को चलना नहीं बल्कि पैर आगे रखने को चलना कहते है. इतनी सी बात समझने मे बहूत समय लग गया.