जाति से बड़ा है धर्म
हम भारतीय लोग स्वभाव से धार्मिक लोग है हमारे हर कार्य में धर्म की भूमिका होती ही होती है चाहे हम सुबह सबसे पहले नींद से जगे तो धरती पर पैर रखने से पूर्व हम धरती मंत्र का जाप करते हैं खाना खाने से पूर्व हम ईश्वर की स्तुति करते हैं यात्रा करने से पूर्व भी हम धार्मिक विधि विधान से यह विचार करते हैं कि किस दिन को किस दिशा में यात्रा की जाए और किस दिशा में न कि जाए किस दिन को किस दिशा के लिए दिशाशूल है और किस दिन को नहीं है. जिस समाज के जीवन में धर्म की इतनी बेहतरीन भूमिका है आखिर वो समाज जाती के दंशकारी बंधनों में जकड़ा कैसे आखिर ऐसा क्या हुआ कि धर्म के आधर पर जन्मी जाती आज धर्म से बड़ी हो गई है.
भगवान श्री कृष्ण गीता मे कहते हैं.....
चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागशः।
तस्य कर्तारमपि मां विद्ध्यकर्तारमव्ययम् ।।
अर्थात, अपने अपने गुणों और कर्मों के द्वारा ही हमने इस समाज को चार वर्णों के आधर पर बांटा है.
मूल बात तो यह हो गई कि हमारे यहां समाज का विभाजन चार वर्ण के आधार पर किया गया. जिसमें जो ज्ञानी हुआ जिसे समाज, धर्म, राजनीति, शिक्षा, व्याकरण, ज्योतिष इत्यादि विषयों की समझ रही उसे पंडित कहा गया दूसरा वो जिसके भुजाओं में पुरुषार्थ था जो धर्म के लिए लड़ाई करने मे सक्षम था उसे क्षत्रिय कहा गया तीसरा जो व्यापार वर्ग से संबंधित था उसे व्यापारी कहा गया और चौथे वो लोग थे जिनके पास कोई योग्यता नहीं थी शिक्षा और कला के दृष्टि से अत्यंत निम्न कोटि के लोगों को शूद्र कहा गया.
इसमे यह नियम रखा गया कि कालांतर में ब्राह्मण का बेटा भी शूद्र और शूद्र का बेटा भी ब्राह्मण हो सकता है अपने अपने गुणों के अनुरूप. हमारी यही दृष्टिकोण समय के साथ समाप्त हो गई और हम वर्ण व्यवस्था पर आधारित समाज के सिधांत को गुण और कर्म के आधार पर नहीं ब्लकि जन्म के आधार पर देखने लगे और यही हमारी सारी समस्याओं का केंद्र है
आज जो हिन्दू समाज इतना कमजोर है उसके पीछे यही कारण है कि हम और आप अपने समाज को धर्म के व्यापक दृष्टिकोण पर न देख कर जाती के संकीर्ण सोच पर देखने लगे हम अपना अपना हित साधने मे लगे हुए हैं पर हमे यह नहीं भूलना चाहिए कि जिस जाती के गुमान मे आकर हम धर्म से मुह मोड़ बैठे है वह धर्म के कमजोर होते ही टूट जाएगी क्यु की जाती का आधर धर्म है न कि धर्म की आधार जाती. अगर धर्म नहीं बचा तो जाती के बचने का कोई सवाल ही है मैं आखिर में इतना ही आग्रह करूंगा कि जिस देश का समाज अपने धर्म से बढ़कर जाती को महत्व देता है वह धीरे धीरे विश्व के मानचित्र से भुला दिया जाता है. इसलिए यह जरूरी है कि हम इस बात को समझे की कभी भी जाती से बड़ा है धर्म.
आपका अपना
विक्रम गोस्वामी
Bahut Sundar Bhaiya Ji
ReplyDeletenice
ReplyDeleteजय हो
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