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आप भी बन सकते हो धनवान

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आप भी बन सकते हो धनवान  मानव जब से सभ्य हुआ अर्थात यूँ कहें कि वह जब से कबीलाई समाज से पृथक हो कर समाज में सामुहिक रूप से रहने लगा तब से उसके जीवन में अर्थ का अर्थात धन का महत्व किसी न किसी दृष्टि से बना हुआ है. तमाम कारणों मे से एक प्रमुख कारण अर्थ भी है जो समाज में वर्ग संघर्ष का कारण बना हुआ है और आज की स्वीकृत सामाजिक मान्यता के अनुसार धन ही आपकी सामाजिक प्रतिष्ठा तय कर रही है.  तो फिर हम भी अमीर कैसे बन सकते हैं आइए इस पर विचार करे.  हम सब अपने जीवन में कुछ न कुछ कार्य करते हैं और पैसा कमाते हैं जिस से की हमारा जीवन बेहतर चले और हमारे परिवार का भी. जिसमें से अधिकतर लोग अधिक पैसा कमाने की नहीं सोचते ब्लकि अधिक से अधिक पैसा बचाने की सोचते हैं और यहीं अपने मूल उद्येश्य से भटक जाते हैं. हमे पैसे बचाने से अधिक कमाने के विषय में सोचना चाहिए क्यु की हम जानते हैं कि तालाब अपना पानी बचा कर रखता है आगे नहीं जाने देता परंतु समय के साथ वह खराब हो जाता परंतु नदी अपनी पानी नहीं रोकती वह अपने प्रवाह को बनाए रखती है फिर भी उसका पानी साफ़ भी रहता है इसका यही कारण है कि नद...

बिन बाल्मीकि अधूरा सा है सनातन......

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भारत वर्ष का इतिहास महर्षियों का इतिहास है जिसमें महर्षि वाल्मीकि है, वेद व्यास हैं, संत रविदास हैं और ऐसे नामों की लंबी सूची है. जब कि हम यह जानते हैं कि सनातन का अर्थ होता है - जिसका आदि और अंत न हो अर्थात जो अनंत हो जिसका शुरूवात भी न मालूम हो और अंत भी न मालूम हो तो स्वभाविक है कि ऐसे धर्म में महर्षि वाल्मीकि से पहले भी ऋषि हुए होंगे और बाद में भी. फिर भी कुछ विशेष अर्थों में देखा जाए तो महर्षि वाल्मीकि के बगैर सनातन अधूरा सा प्रतीत होता है. एक तो महर्षि वाल्मीकि आदिकवि है दूसरा उन्होंने अध्यात्म रामायण की रचना की चुकी इस देश में और भी बहुत रामायण लिखा गया है जैसे - तमिल भाषा में कंबन, उड़िया मे विलंका, कन्नड मे पंप और अवधि में रामचरितमानस फिर भी महर्षि वाल्मीकि का विशेष महत्व इस अर्थ में है कि उन्होंने सबसे पहले राम कथा की रचना की और शेष सभी राम कथाओं पर उनके राम कथा का प्रभाव देखा गया है. यदि वाल्मिकी कृत रामायण नहीं होता तो देश में आज किसी भी भाषा में कोई भी राम कथा नहीं होती. यहां यह भी ध्यान रखना होगा कि पूरे विश्व में महर्षि वाल्मीकि कृत अध्यात्म रामायण और गोस्वाम...

आप क्या हैं? आप की संगत बताती है

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आप क्या हैं आप की संगत बताती है. भक्ति आंदोलन के परिणाम स्वरुप जन्मे रहीम ने कभी कहा था कि..... "संगत से गुण होत है संगत से गुण जात" अर्थात, आप के अंदर कैसे गुण है या आप कैसे गुण सीख रहे हैं ये आप की संगत तय करती है यदि आपकी संगत अच्छी है तो आपके गुण भी अच्छे हैं और संगत अच्छी नहीं है तो गुण भी अच्छे नहीं है. कहते हैं कि आपका गुण कैसा है ये आपकी संगत (अर्थात दोस्त) बताती है और आपकी हैसियत क्या है ये आपके दुश्मन बताते हैं यहां भी यह विचारणीय है कि हैसियत बेशक दुश्मन बताए पर गुण तो संगत से ही तय होगी. आईए दो महाकाव्यों अर्थात रामायण और महाभारत से से दो प्रबल उदाहरण लेते हैं.  दुर्योधन का संग कर्ण को प्राप्त था और राम का संग विभीषण को प्राप्त था परंतु इतिहास साक्षी है कि कर्ण जैसा सात्विक पुरुष दुर्योधन के संगत में आकर धर्म और अधर्म मे अन्तर नहीं कर सका और अधर्म की ओर से युद्ध किया परंतु वही विभीषण जो कि रावन के साम्राज्य मे रहा परन्तु राम का संगत पा कर धर्म  करते हुए धर्म की ओर से युद्ध किया और ये चरम उदाहरण है संगत से गुण होने का और नहीं होने का.  संगत में गुण ...

बेरोजगारी का मूल कारण

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मानव समाज का इतिहास समस्याओं का इतिहास है मनुष्य अपने जीवन के शुरुआती काल से ही समस्याओं से टकराते आ रहा है और एक सच्चाई यह भी है कि समस्या मनुष्य के जीवन में नहीं बल्कि हर एक जीव को है जो पृथ्वी पर पल बढ़ रहा है उसके जीवन मे समस्या निरंतर बनी हुई है. पर मनुष्य के जीवन में आज की समस्या रोटी कपड़ा और मकान की नहीं है, है भी तो आंशिक तौर पर फिर आज की बड़ी समस्या क्या है जिस से हम सब ही नहीं ब्लकि हमारी और आपकी आने वाली संततिया भी जुझेगी. मैं अपने समान्य समझ से कहूँगा की आज की बड़ी समस्या है बेतहाशा जनसंख्या वृद्धि ज्यादा बेहतर यह होगा कि इसे जनसंख्या वृद्धि नहीं ब्लकि जनसंख्या विस्फोट कहा जाए और विस्फोट मैं विस्फोट शब्द का प्रयोग इस लिए भी कर रहा हूं क्यु भारत मे प्रति वर्ष जनसंख्या वृद्धि दर 2010 से लेकर 2019 के बीच 1.2 फीसदी बटाया गया जो इतने विशाल जनसंख्या वाले देश के लिए खतरनाक है.  यह समझने वाली बात है कि हमारे पास संसाधन सीमित है और जनसंख्या असीमित हमारे पास रेल्वे ट्रैक, रोड, रोजगार, नौकरी और प्राकृतिक संसाधन सब कुछ सीमित है पर जनसंख्या असीमित.  इसक...

जाति से बड़ा है धर्म

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हम भारतीय लोग स्वभाव से धार्मिक लोग है हमारे हर कार्य में धर्म की भूमिका होती ही होती है चाहे हम सुबह सबसे पहले नींद से जगे तो धरती पर पैर रखने से पूर्व हम धरती मंत्र का जाप करते हैं खाना खाने से पूर्व हम ईश्वर की स्तुति करते हैं यात्रा करने से पूर्व भी हम धार्मिक विधि विधान से यह विचार करते हैं कि किस दिन को किस दिशा में यात्रा की जाए और किस दिशा में न कि जाए किस दिन को किस दिशा के लिए दिशाशूल है और किस दिन को नहीं है. जिस समाज के जीवन में धर्म की इतनी बेहतरीन भूमिका है आखिर वो समाज जाती के दंशकारी बंधनों में जकड़ा कैसे आखिर ऐसा क्या हुआ कि धर्म के आधर पर जन्मी जाती आज धर्म से बड़ी हो गई है. भगवान श्री कृष्ण गीता मे कहते हैं..... चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागशः। तस्य कर्तारमपि मां विद्ध्यकर्तारमव्ययम् ।। अर्थात, अपने अपने गुणों और कर्मों के द्वारा ही हमने इस समाज को चार वर्णों के आधर पर बांटा है. मूल बात तो यह हो गई कि हमारे यहां समाज का विभाजन चार वर्ण के आधार पर किया गया. जिसमें जो ज्ञानी हुआ जिसे समाज, धर्म, राजनीति, शिक्षा, व्याकरण, ज्योतिष इत्यादि विषयों की सम...

सम्वेदनाहीन राजनीति - न अपनी न पराई

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मानव सभ्यता के इतिहास में मानव का जितना अपने जरूरतों से सम्बंध रहा है उतना ही राजनीति से भी चाहे तो उसका स्वरुप हर दौर और हर दशक में अलग अलग ही क्यु न हो, मनुष्य जब से सभ्य हुआ और सामाजिक रूप से संगठित हुआ तब से उसका प्रयास एक ऐसी व्यवस्था विकसित करने की रही है जो उसके समाज का संचालन करता रहे और उसके भलाई के लिए नीति से लेकर नियम बनता रहे उसको एक ऐसी नीति की आवश्यकता पडी जो समान्य जनमानुष पर राज करे और यहीं से जन्म होता है राजनीति का. पर प्रश्न उठाता है कि राजनीति का स्वरुप कैसा होना चाहिए ? उसको कितना शाश्वत और कितना सम्वेदनशील होना चाहिए ? यह कहना भी उचित है कि राजनीति कठोरता की मांग करती है और परंतु कठोरता संवेदनहीनता का पर्याय तो नहीं और कठोरता और संवेदनहीनता मे कितना अन्तर है यह कौन निश्चित करेगा. क्या यह सच नहीं है कि आज राजनीतिक रूप से हम इतने सम्वेदनहीन हो गए हैं कि हम हर रोज अखबार में मरती  हुई जिंदगियों की ख़बरें पढ़ते हैं और आगे बढ़ जाते हैं हमे इस बात से कोई फर्क़ ही नहीं पड़ता कि खेलने के उम्र में किसी बेटी की बलात्कार हो गई हमे इस से भी कोई फर्क़ नहीं पड़त...

कृष्णनीति सफलता का मूलमंत्र

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*कृष्णनीति सफलता का मूलमंत्र*  जीवन में आने वाले सभी सुख और दुख हमारी नीतियों पर आधारित है जैसी हमारी नीति होती है वैसा ही उसका परिणाम भी होता है। किसी भी कार्य को सफल करने के लिए एक अच्छी नीति की आवश्यकता होती है। नीतियां हम अपने आदर्शों को देखकर व उनसे सीख कर बनाते हैं। प्रत्येक व्यक्ति सफल होना तो चाहता है परन्तु उसकी गलत नीतियों सफलता मे बाधक होती है। दुनिया की सर्वश्रेष्ठ नीति भगवान श्री कृष्ण की नीति है श्री कृष्ण का समूचा जीवन मे धर्म युद्ध चलता रहा अधर्म के विरुद्ध महाभारत श्री कृष्ण का अंतिम युद्ध था। जब सत्य पर असत्य हावी होने लगे तो हमें श्री कृष्ण नीति के अनुसार ही निर्णय लेना चाहिए।  *कृष्णनीति:*    *1.मत की स्पष्टता।*  भगवान श्री कृष्ण के संधि संदेश को जब दुर्योधन ने ठुकरा दिया तो भगवान कृष्ण कर्ण को समझाते हैं परंतु कर्ण का मत स्पष्ट था वह युद्ध दुर्योधन की ओर से ही करेगा। किस संवाद के उपरांत जब भगवान कृष्ण पांडवों के पास जाते हैं तो उनको  उनका साथ देने वाले मित्र राजाओं और शत्रु राजाओं के बारे में विस्तार पूर्वक बताते हैं। स्पष्ट...