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विदेशी घुसपैठियों पर सरकार का रवैया सुस्त क्यों?

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विदेशी घुसपैठियों पर सरकार का रवैया सुस्त क्यों? वो लोग जो इजरायल और फिलिस्तीन पर ज्ञान दे रहे है। वो सभी  लोग रोहिंग्या और बांग्लादेशी घुसपैठियों पर मौन क्यों हो जाते है क्या उनको दिखना बन्द हो गया है। हमारे संसाधनों पर उनका कब्जा हो रहा है। देश के संसाधनों पर भारत के लोगो का अधिकार है। देश की स्थिति व परिस्थिति किसी से छिपी नहीं है भारत की आबादी के अनुसार भारत में सीमित संसाधन है। पर जो भी संसाधन भारत जुटा पाया है  उन सभी पर भारत के नागरिकों का पहला अधिकार होना चाहिए परंतु देखा जाता है कि जो रोहिंग्या और बांग्लादेशी लोग भारत में आ बसे हैं उनको भी भारत में उसी तर्ज पर महत्व दिया जाता है जैसे कि भारत के मूल निवासियों को दिया जाता है।   भारत एक विकासशील देश है। इसी विकास के लिए देश के नागरिक टैक्स भरते हैं  टेक्स के द्वारा ही भारत की उन जरूरतों को पूरा किया जाता है जिससे कि भारत के प्रत्येक नागरिक को जरूरी सुविधाएं दी जा सके। जैसे की स्वास्थ्य, शिक्षा, इंफ्रास्ट्रक्चर परंतु इन सुविधाओं पर उन विदेशी लोगों का कोई अधिकार नहीं है जो लोग गैरकानूनी तरीके से...

फिलीस्तीन और इजरायल के बीच खूनी संघर्ष जारी है।

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फिलीस्तीन और इजरायल के बीच खूनी संघर्ष जारी है। यह दोनों ही देश एक लंबे समय से जंग के साए में जी रहे हैं पूरी दुनिया इन दोनों देशों को टकटकी लगाए देख रही है। भीषण बमबारी के चलते आसमान हुए से पटा हुआ है। यहूदी और इस्लाम में बहुत ही समानता होने के बावजूद यह युद्ध धर्म के आधार पर लड़ा जा रहा है। इस जंग का मूल कारण 35 एकड़ का भूभाग है  जिस पर यहूदी, मुस्लिम और ईसाई अपना आधिपत्य स्थापित करना चाहते हैं। यह स्थान यहूदी धर्म, ईसाई धर्म और इस्लाम धर्म के लिए बेहद पवित्र स्थान है। यहूदियों के अनुसार ये एक पवित्र सुलैमानी मन्दिर था, जिसकी मात्र एक  दीवार बची है। यही मूसा ने यहूदियों को यहूदी धर्म की शिक्षा दे थी। ईसाई मत अनुसार यही शहर ईसा मसीह की कर्मभूमि रही है। इस्लाम के अनुसार इस ही स्थान से हजरत मुहम्मद बुर्राक़ पर सवार होकर जन्नत की सैर पर गए थे।  इतिहास का अध्ययन करने के बाद पता चलता है। विवाद के तार इतिहास से जुड़े हैं इस विवाद को समझने के लिए इतिहास को जानना बेहद जरूरी है अगर हम बात करते हैं यहूदी धर्म की तो यहूदी धर्म का उदय ईसा से लगभग 2000 साल पहले हुआ था। इस...

"कौन है ये खोसे"

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अधिकांश लोगो के लिए ये नाम नया है  पुराने दौर में जब भी कोई राजा किसी राज्य पर हमला करता था तो सबसे आगे अफवाह फैलाने वाले जाते, उनके पीछे कुछ गुप्तचर। इसके कुछ किलोमीटर पीछे सैनिक होती। इसमें भी सबसे आगे कुछ घुड़सवार, फिर नाचने गाने वाले, ढोल, ताशे पीटने वाले और फिर मुख्य सैन्यदल। मुख्य दल में राजा बीच मे होता था सेनापति, सेना, राजा को सुरक्षित रखते थे तोपख़ाना,मज़दूर, रसोईदल, सफाई दल, हकीम, वैद्य वग़ैरह। इस सभी को राजा द्वारा पग़ार दी जाती थी।  परन्तु फौज के आख़िर में एक टोली और भी चलती थी। इनको न पैसा मिलता और न कोई मेहनताना, लेकिन ये साए की तरह हर सेना से थोड़ी दूरी बनाकर चलते और हर जगह युद्ध की ख़बर सूंघते हुए पहुंच जाते थे। मध्य एशिया में इनको ख़ोस या कफनखसोट कहा जाता था। इनका काम जंग के उपरांत, हारा दल मैदान से भाग जाता या बंदी बना लिया जाता। जीता हुआ दल राजधानी और संसाधनों पर क़ब्ज़ा करने आगे बढ़ जाता। विजेता शवों को वहीं दफ्न कर जाते, दाह-संस्कार कर जाते या ऐसे ही छोड़कर भी आगे बढ़ जाते। यहां से ख़ोसों का काम शुरू होता। ख़ोसे लाशों के शरीर पर मौजूद कवच और अं...

"मंजिल अब दूर नही है"

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"मंजिल अब दूर नही है" मन मे कर दृढ़ विश्वास चलो, अपनों को ले कर साथ चलो।। शूल बिछे पथ पर चलना है, रव पर कर विश्वास चलो।। धूप छाव बरखा रोकेगी, बन अर्जुन गांडीव लिए साथ चलो। पग पग पर दुनिया टोकेगी, बन नीर नदी का बहते चलो।। देख ली जिसने राह मंजिल की, अब उसकी मंजिल दूर नही है ॥ आलस की छोड़ बिछौनि, परिश्रम पथ पर बढ़े चलो॥ मान अपमान के तोड़ो बंधन, सब का कर सम्मान चलो॥ कुत्ते भौके तो क्या होगा,  बन मदमस्त हाथी बढ़े चलो॥ राह है लम्बी है घनघोर अंधेरा, दीप ज्ञान का सुलगाए चलो॥  कोयला हीरा बन जाता है,   संघर्ष की ज्वाला जलाए चलो॥                    (Vikram Goswami)

माना है घनघोर अंधेरा,पर तू क्यों घबराता है।।

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माना है घनघोर अंधेरा, पर तू क्यों घबराता है।। अमर नही है जग मे कोई, जो जन्मा है वो एक दिन जाता है॥ तू तो है एक कटपुतली प्यारे, डुगडुगी जीवन की विधाता ही बजाता है॥ कर्म करना है काम तेरा बस, फल के लालच मे क्यों फस जाता है॥ तुझको नही विश्वास राम पर, इसलिए कष्टों मे तू घिर जाता है॥ माना है घनघोर अंधेरा, पर तू क्यों घबराता है।। जो होना है वो हो कर ही रहेगा,  फिर क्यो चिंता के सागर मे फंसता जाता है॥ जो मुठि बांधे आता है,  वो हाथ पसारे जाता है॥ जो जानी नही है साथ तेरे, ऐसी दौलत पर तू क्यों इतराता है॥ जो लिखी है तेरे खाते मे,  उसे छीन कोई कहा पाता है॥ साँस की गिनती तय है प्यारे, कोई अधिक नही ले पाता है॥ माना है घनघोर अंधेरा, पर तू क्यों घबराता है॥  जिनका है संबंध राम से, उसका बुरा कहा कोई कर पाता है॥  जो रखते है सदा धैर्य, सुखद जीवन वही पाता है॥ चीर अंधेरे की छाती को,  सूरज अम्बर मे छा जाता है॥ छोड़ दे वन्दे सब कुछ रव पर,  वही जन्म और मृत्यु का दाता है॥                          (विक्रम गोस्वामी)

गोस्वामी समाज का इतिहास

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गोस्वामी समाज केवल एक जाति नही बल्कि एक सम्प्रदाय है एक ऐसा पंथ जो सदैव से ही भगवान महादेव की आराधना को अपना प्रथम कर्तव्य मानते हुए सनातन धर्म का प्रचार प्रसार  करता है। अनादिकाल से शैव ब्रह्मणों का ये सम्प्रदाय पठन पाठन, योग व अनेकों प्रकार के शोध के कार्य मे व्यस्त रहता था।  कुछ जानकारों के अनुसार इस पंथ का उदय आदिगुरू शंकराचार्य जी के समय हुआ था। जबकि अगर गहनता से अध्यन करें तो पता चलता है ये पंथ अनादिकाल से भगवान महादेव की सेवा मे गणों के रूप मे विधमान है। समय समय पर स्वंय भगवान महादेव ने इस पंथ की पद भ्रष्ट होने व अपने कर्तव्य से विमुखता को रोकने के लिए गुरु दत्तात्रेय, आदि गुरु शंकराचार्य के रूप मे अवतार लिया। व शैव ब्रह्मणों को धर्म रक्षा के लिए प्रेरित किया। धर्मरक्षक सन्यासियों का ये सम्प्रदाय दो भाग मे विभाजित हो गया. गृहस्ती और सन्यासी जो साधु गृहस्त जीवन मे आ गए वह गृहस्थ जीवन मे भी अपनी परम्परा अपने उपनामों से जुड़े रहे। ऐसा नही है की सभी गोस्वामी शैव है वैष्णव सम्प्रदाय मे भी गोस्वामी होते है  आज हम केवल शैव ब्रह्मणों व दशनामी गोस्वामी पर चर्चा क...

कालकाजी मन्दिर दिल्ली

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कालकाजी मंदिर अरावली पर्वत श्रृंखला के सूर्यकूट पर्वत पर स्थित है इस मन्दिर को मनोकामना सिद्धपीठ मन्दिर भी कहा जाता है। माँ कालिका का ये मन्दिर देश के प्राचीनतम सिद्धपीठों में से एक है।  इस पीठ का अस्तित्व अनादि काल से है। मान्यता है कि इस ही स्थान पर आद्यशक्ति महाकाली के रूप में प्रकट हुई। और असुरों का संहार किया। माँ पार्वती ने कौशिकी देवी को प्रकट किया। जिन्होंने अनेक असुरों का संहार किया लेकिन रक्तबीज को नहीं मार सकीं। तब माँ पार्वती ने अपनी भृकुटी से महाकाली को प्रकट किया। जिन्होंने रक्तबीज का संहार किया। महाकाली का रूप देखकर सभी भयभीत हो गए। देवताओं ने माँ काली की स्तुति की तो माँ भगवती काली ने कहा जो भी इस स्थान पर श्रृद्धाभाव से पूजा करेगा, उसकी मनोकामना पूर्ण होगी। तब से ही यह मनोकामना सिद्धपीठ के रूप में विख्यात है।  एक कथा ये भी इस मन्दिर से जुड़ी है।  महाभारत काल में युद्ध से पहले भगवान श्रीकृष्ण ने पांडवों के साथ यहां भगवती महाकाली की अराधना की थी। मुख्य मंदिर में 12 द्वार हैं, जो 12 राशियों का संकेत देते हैं। वहीं परिक्रमा स्थल के...