दलितों का शोषण दलित ही कर रहें है. विक्रम गोस्वामी
कभी शूद्र क़हलाने वाले हमारे भाइयों को महात्मा गांधी जी ने "हरिजन" का सम्बोधन दिया यानी हरि के जन , भगवान हरि के पुत्र, उनके उत्थान की बात करने वाले कुछ हरिजन नेताओ ने ही हरिजन शब्द को कही छुपा दिया और एक नया शब्द दिया "दलित" अथार्थ जो दला गया हो या शोषित हुआ हो, अब "दलित" शब्द से संबोधन किया जाता है उन मेहनतकश लोगों को जो केवल सेवा को अपना धर्म मानते रहें है उनको अलग अलग नाम से संबोधित किया जाता रहा है कुछ शब्द ऐसे भी है जो किसी गाली से कम नहीं है.
पर इस सब के पीछे आखिर कौन है जिसके कारण ये समाज पिछड़ता गया और आज भी विशेषआ अधिक (आरक्षण) होने के बावजूद पिछड़ता ही जा रहा है. कहीं ऐसा तो नहीं आरक्षण चंद लोगों की बपौती बन कर रह गया हो. उन लोगों तक ये विशेष अधिकार पहुंचा ही नहीं जिनको इस की वास्तविकता में आवश्यकता थी ऐसा लगता है कुछ लोगों ने आरक्षण के लाभ को केवल, अपने व अपने परिवार से आगे जाने ही नहीं दिया।
जिस समाज ने लम्बे समय तक शोषण झेला है उस समाज को आरक्षण मिलना चाहिए व जरूरतमंद को सुविधा मिलनी चाहिए.
इस बात का विरोध करना गलत होगा पर कुछ लोग इस भेदभाव की चिंगारी को अपनी राजनैतिक महत्वकांक्षा के लिए हवा देने का काम कर रहें है अधिकांश लोग दलित - दलित राग अलापते हुए धनपति कुबेर हो गए और बेचारे हरिजन शोषित ही रह गए,
बड़े बड़े पद पर पहुंचने के बाद सत्ता व पावर के नशे मे समाज से दूर होने लगते है उनको समाज केवल अपना हुक्का भरवाने के लिए याद आता है या फिर कुर्सी जाने के बाद झूटा रौब जमाने के लिए ये लोग जब सत्ता मे होते है तो चश्मा लगाकर बात करते है इन के बच्चें बाहर पढ़ते है दलित एकता के लिए नारे गरीब के बच्चें लगते है जो आंदोलन के बाद भी नौकरियां के लिए धक्के खाते है
समाज के उथान के नाम पर बहुत सी NGO व आर्मी बनती है या तो वो राजनीति से प्रेरित हो कर राजनेता बनाने के लिए या फिर पैसा कमाने के लिए और कुछ समय के बाद नए आंदोलन के साथ नया संगठन नए पदाधिकारि. कार्यकर्ता वहीं जो हर बार ठगे जाते रहें है चंद लोगों को छोड़ दे तो आज भी ये वर्ग संघर्ष का जीवन जी रहा है और कुछ लोग अपने स्वर्थ के चलते इन को बरगलाने का काम कर रहें है जो अपना धर्म बदल चुके है ये बात भी नहीं भूलनी चाहिए सनातन धर्म समानता का धर्म है,तो वास्तविकता में उन्हें दला किसने? ये प्रश्न विचारणीय भी है सवेंदनीय भी।
Bhai baat toh bahut solid khi poori sachaai hai ish lekh mein
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