"दोष चौपाई मे नही तुम्हरी सोच मे है"


प्रभु भल कीन्ह मोहि सिख दीन्हीं। 
मरजादा पुनि तुम्हरी कीन्हीं॥
ढोल गवाँर सूद्र पसु नारी।
सकल ताड़ना के अधिकारी॥

रामचरितमानस के सुन्दरकाण्ड से ली गई ये चौपाई आप ने कई बार सुनी होगी। कुछ लोग सनातन धर्म के विभाजन की मनसा से अधूरे ज्ञान को ऐसे प्रस्तुत कर रहे है जैसे उनसे बड़ा ज्ञानी कोई इस धरा पर नही है। 

ढोल गवाँर सूद्र पसु नारी।
सकल ताड़ना के अधिकारी॥

इस अधूरी चौपाई को बड़े बड़े मंचों से उच्चारित किया जाता है। ऐसा भी  नही है की वे लोग इस का सही अर्थ नही जानते है। या फिर उनको पता नही है। परन्तु वे इसको अधूरा प्रस्तुत कर लोगो मे भेद(फूट) डालना चाहते है। कुछ लोग ताड़ना के स्थान पर प्रताड़ना बोलते है जो की पूरी तरहा से गलत है ।
ताड़ना व प्रताड़ना दोनो शब्दों के अर्थ अगल-अलग है! अगर हम इस चौपाई की बात करें तो  ऊपर की पंक्ति, 
प्रभु भल कीन्ह मोहि सिख दीन्हीं। 
मरजादा पुनि तुम्हरी कीन्हीं॥
इससे ये साफ स्पष्ट हो जाता है की अगली पंक्ति मे ताड़ना शब्द का अर्थ सीख देना है। आमतौर पर लोग चालाकी के लिए भी इस शब्द का इस्तमाल करते है। वह काम को जल्दी ताड़ लेता है। अर्थात सीख लेता है। "ताड़ना" एक अवधी शब्द है, जिसका अर्थ - घूरना, टकटकी लगा कर देखना, पहचानना, परखना, निगरानी करना, ध्यान रखना, या देखरेख करना होता है।
उदहारण: भैया मोरी बछीयां को ताड़ें राखिओ, 
अर्थात मेरी गाय पर ध्यान रखना, 
 बुंदेली भाषा मे उदहारण:  इते सुनो तनक लरका बच्चन को ठीक सें "ताड़त" रहियो। 
अर्थात यहाँ सुनो जरा लडके बच्चों का ठीक से ध्यान रखना। 
प्रथम पंक्ति ही स्पष्ट कर देती है की यहा  तुलसीदास जी की अपनी सोच नहीं है। तुलसीदास जी बता रहे है जब तीन दिन की पूजा के उपरांत समुद्र देव प्रकट हुए तो वो इस चौपाई के मध्यम से रस्ता ना देने के पीछे की विवशता को बताते है। 
जैसे:-  'ढोल'- को बाजने से पहले सीखना पड़ता है। और अच्छी ताल तभी आती है  

'गँवार'- को भी ताड़ना पड़ता है अर्थात् समझना पड़ता है. क्योंकि उसके पास ऐसी स्पष्ट भाषा नहीं है जिससे वो सभी को समझा सके इसलिए उसकी भावनाओं को समझना जरुरी है 

'शूद्र'- का अर्थ सेवा करने वाले से है सेवक अपने स्वामी से बहुत सी बात बोलने में संकोच करता है इसलिए उसकी हिचकिचाहट को बिना समझे व्यवहार नहीं करना चाहिए!

'पशु'- के पास केवल स्वर है भाषा नहीं, ना ही व्याकरण, इस लिए उस को समझना बहुत ही अवश्यक है 

'नारी' [अच्छी-बुरी दोनों प्रकार की], नारी लज्जा पर्याय मानी जाती थी आदर्श और सोन्दर्य की मूर्त होती है  दूसरी और मंथरा, सुपर्णकां जैसी भी नारी हो सकती है इस लिय नारी भी ताड़न की अधिकारी थी। बुरी नारियों की शाह पाना मुश्किल रहा है. जिस तरह श्री राम को सुपर्न्खां को समझने में समय लगा. अतः वह भी समझने की अधिकारिणी रही। 

कुछ लोग लगे है अर्थ का अनर्थ करने में! केवल विभाजन की बात करने वाले कभी रामचरितमानस की भगवान  श्री राम के शबरी के प्रतिभाव पर चर्चा नही करेंगे। न ही भगवान श्री राम और केवट की मित्रता पर प्रकाश डालने का कार्य करेंगे। उनका उदेश्य केवल सनातन धर्म को खंडित करना है.

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