"आप की समस्या इस लिए बड़ी है क्योंकि आपने गीता नही पढ़ी है"
हर एक व्यक्ति को लगता है ईश्वर ने दुनिया के सभी दुख उसके खाते मे लिख दिए है सभी को लगता है की उसकी समस्या दूसरों से काफी बड़ी है कभी कभी तो ईश्वर भी इनके द्वारा कोशा जाता है. सुख के अनुपात मे दुःख अधिक आता है. बहुत कुछ पा कर भी व्यक्ति निराश ही कालचक्र पूरा करके चला जाता है. आमतौर पर आप और हम सुनते है। एक दूसरे को संबोधित करते हुए. बस चल रहा है, समय काट रहे है, समस्या तो समस्या ही होती है पर उसके रूप अलग अलग है कोई तन से, कोई मन से, कोई धन से दुःखी होता है किसी को पद प्रतिष्ठा चाहिए, किसी को मान सम्मान चाहिए, सभी के जीवन मे कुछ ना कुछ गठित हो रहा है जो उसको चिन्तित करता है चिंता का समय से निदान नही किया जाए तो वह बहुत विराट रूप ले लेती है
ऐसा ही परिस्थिति कुरुक्षेत्र मे महान धनुर्धर अर्जुन के सामने भी आई थी जब रणभूमि सज चुकी थी और अर्जुन सही निर्णय नही ले पा रहे थे और वो युद्ध के प्रारम्भ से पहले ही हार मान चुके थे. अर्जुन को हताश और निराश देख भगवान श्री कृष्ण ने अर्जुन को गीता का उपदेश दिया।
ये वो समय था जब अर्जुन अपना आत्मविश्वास खो रहा था. परिवार के प्रति उसका मोह और अपनो को खोने का डर का सता रहा था जिसके कारण अर्जुन सोच रहे थे जिनसे मे युद्ध कर रहा हूँ वो सभी तो मेरे अपने है इन्हें मे कैसे मार सकता हूँ। स्वंय से घृणित हो कर अर्जुन शौक मे डूब गये।
दूसरी और कौरव खड़े थे जिनका मत स्पष्ट था केवल पाण्डवों को मिटाना है हर कीमत पर युद्ध जितना है चाहे जीत के लिए छल, कपट और युद्ध के नियमों का उल्लंघन भी क्यो न करना पड़े।
अर्जुन के अवसाद को देख भगवान कृष्ण ने गीता ज्ञान देना प्रारम्भ किय
गीता के कुल 18 अध्याय है और 700 श्लोक है। जिनमे से 574 श्लोक श्रीकृष्ण द्वारा, 84 श्लोक अर्जुन द्वारा, 41 श्लोक संजय द्वारा और 1श्लोक धृतराष्ट्र द्वारा कहा गया हैं।
गीता मे जो कुछ भी कहा गया है उससे भय, तनाव, निराशा, अवसाद, और क्रोध जैसे विकारों से मुक्ति मिलती है, सहजता से व्यक्ति स्वंय को पहचान सकता है, जिससे वे अपनी क्षमता अनुसार सही निर्णय ले सके।
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