पाण्डवों की राजधानी इस आधुनिक युग मे दिल्ली के नाम से जानी जाती है
इन्द्रप्रस्थ से ढिल्लिकापुरी और वर्तमान मे दिल्ली. अनेकों बार दिल्ली मे बहने वाली जमना खून से लाल हुई है इस दिल्ली ने कई युद्ध देखे है कई बार लूटी फिर बसी ये दिल्ली हर विदेशी आक्रांताओं के निशाने पर रही है दिल्ली जब हम दिल्ली के इतिहास को खंगालते है तो पता चलता है। जो हमें पढ़ाया जा रहा है उसमे केवल विदेशी आक्रांताओं का महिमामंडन किया जा रहा है। उनकी लूट को भारत पर महानता के नाम पर थोपा जा रहा है।
दिल्ली के वास्तविक संस्थापक राजा अनंगपाल तोमर प्राथम थे (736-754 ई.) उनके योगदान व उनके चरित्र को छिपाया गया। अनंगपाल तोमर द्वितीय ने महरौली के विष्णु स्तंभ की स्थापना कराई। और कई मंदिरों का निर्माण कराया. जिनमें जैन मन्दिर भी शमिल थे। उनके द्वारा बनाए गए मंदिरों व महल का वर्णन आमिर खुसरो मे भी उल्लेख है। सभी मंदिरों को ध्वंस कर कूतूबदीन ऐबक ने कुब्ब्तुल मस्जिद बनवाई थी। जिसे आज कुतुब मीनार कहा जाता है वो भी एक मन्दिर ही था। अनंगपाल तोमर जी का इतिहास बड़ा शौर्यवान था। उनके द्वारा एक छोटी सी सुन्दर झील अनंगताल का निर्माण कराया। जो की फरीदाबाद के अनंगपुर गावं के पास स्थित है। कुछ इतिहासकारों के अनुसार दक्षिण दिल्ली मे स्थित किला ही उनका महल लाल कोर्ट था। जिसको गयासुद्दीन तुग़लक़ ने 1321 मे अपना ठिकाना बनाया. अनंगपाल तोमर तृतीया के बाद दिल्ली की सत्ता पृथ्वीराज चौहान ने संभाली जो दिल्ली के अंतिम हिन्दू राजा थे. हिन्दू राजाओ के इतिहास व उनके विषय मे बहुत कुछ नही कहा गया है. शासन की अवधि की अगर बात करते है इस बात को भी मानना पड़ेगा। जो शासक सत्ता पर काबिज हुआ। उसने पुराने इतिहास को मिटा दिया या बदलवा दिया. हम देखते है राजाओ के नाम के साथ प्राथम,द्वितीया,तृतीया लगाया जाता था। क्योंकि सटीक जानकारी के लिए बहुत से इतिहासकारों को पढ़ना व समझना पढ़ता है।
एक कथा ये भी है जिसपर कुछ इतिहासकारों मे मतभेद है अवधि व नाम को लेकर कुछ इतिहासकारों के अनुसार।
अजमेर की महारानी कपुरीदेवी अपने पिता अनंगपाल की एक लौती संतान थी. इसलिए उनके सामने सबसे बड़ी समस्या यह थी, कि उनकी मृत्यु के पश्चात उनका शासन कौन संभालेगा. उन्होने अपनी पुत्री और दामाद के सामने अपने दोहित्र को अपना उत्तराअधिकारी बनाने की इच्छा प्रकट की और दोनों की सहमति के पश्चात युवराज पृथ्वीराज को अपना उत्तराधिकारी घोषित किया. सन 1166 मे महाराज अनंगपाल की मृत्यु के पश्चात पृथ्वीराज चौहान की दिल्ली की गद्दी पर राज्य अभिषेक किया गया और उन्हे दिल्ली का कार्यभार सौपा गया। परन्तु पृथ्वीराज चौहान अजमेर की गद्दी पर 1179 ई. में बैठे थे वही उनके पिता को अजमेर की गद्दी 1169 ई. में मिली थी। जबकि दिल्ली पर राजा अनंगपाल तोमर का शासनकाल 1051 ई. से 1081 ई. तक रहा जिस समय उनका शासनकाल था उस समय तक तो सम्राट पृथ्वीराज चौहान के पिता सोमेश्वर का जन्म ही नहीं हुआ था तो अनंगपाल तोमर की पुत्री से विवाह कैसे संभव हो सकता है। अगर हम अनंगपाल तोमर तृतीया के कार्यकाल की बात करें। तो स्पष्ट होता है अनंगपाल तोमर पृथ्वीराज चौहान के नाना थे।
अनंगपाल तोमर द्वितीया के बाद
तेजपाल तोमर (1081-1105 ई.)
महिपाल तोमर (1105-1130 ई.),
विजयपाल तोमर (1130-1151 ई.)
मदनपाल तोमर (1151-1162 ई.) अनंगपाल तोमर तृतीया (1162-1178 ई.)
1164 ई. मे तोमर वंश और चौहान सम्राज्य मे विलय हो गया. अजमेर के शासक सोमेश्वर मृत्यु बाद उनके बड़े पुत्र पृथ्वीराज चौहान दिल्ली की गद्दी पर काबिज हुए।
1191 में मोहम्मद गौरी का पृथ्वीराज चौहान से युद्ध हुआ। इस युद्ध में मुहम्मद गौरी को बुरी तरहा हार हुई। और गौरी को बंधक बना लिया गया, लेकिन पृथ्वीराज चौहान ने उसे छोड़ दिया। इसे तराईन का प्रथम युद्ध कहा जाता था। इसके बाद 1192 मे तराईन का द्वितीय युद्ध हुआ। जिसमें मुहम्मद गौरी अधिक ताकत के साथ आया था।इस युद्ध में पृथ्वीराज चौहान की हार हुई। और उनको रात्रि मे धोके से बंधक बना लिया गया। पृथ्वीराज कि दोनों आंखों मे जलते हुई सलाखे डाल दी गई। तब भी उन्होने हिम्मत नही हारी। पृथ्वीराज चौहान अपने शब्दभेदी बाण से मोहम्मद गोरी को मार दिया। मुहम्मद गौरी के बाद उसका गुलाम कुतुबुद्दीन ऐबक को दिल्ली की सत्ता पर काबिज हो गया।
मामलुक राजवंश/ गुलाम वंश (1206-1290)
खिलजी राजवंश (1290 -1320)
तुगलक राजवंश (1320-1414)
सय्यद राजवंश (1414-1451)
अफगान लोदी राजवंश (1451-1526)
1526 के बाद भारत पर मुगलों का शासन चला....
दिल्ली के इतिहास को कुछ इस तरहा प्रस्तुत किया गया है जिसको समझना सहज नही है। कुछ इतिहासकारों मे भिन्नता देखी जा सकती है। नाम और अवधि के रूप मे।
हमारे इतिहास को बहुत ही गलत तरीके से प्रस्तुत किया गया है। जिससे हमारी युवा पीढ़ी भ्रमित हो। और अपने इतिहास पर गौरवान्वित ना हो सके.
अगले भाग मे हम चर्चा करेंगे. आजाद भारत की दिल्ली पर (दिल्ली 1947 से 2021)
Badiya
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