"सभी समस्याओ का एक ही समाधान है श्रीमतभगवतगीता"


जीवन मे हर व्यक्ति अपनी अपनी क्षमता अनुसार कार्य करता है और सफल होने का पूरा प्रयास करता है चंद लोग ही अपनी मंजिल पर पहुँच पाते है अधिकांश लोगो का जीवन संघर्षमय होता है। 

हर कदम पर समस्या, हर कार्य मे कठनाई, लक्ष्य की प्राप्ति से पूर्व ही हार मान लेना ये सब के जीवन का हिस्सा बन गया है। जो समस्या आप के जीवन मे आज है उसका समाधान भगवान श्री कृष्ण ने करीब 5159 साल पहले कुरुक्षेत्र मे गीता के रूप मे दिया था जिसके कुल 18 अध्याय है। 

उन सभी 18 अध्याय को वर्तमान की समस्याओं के समाधान के रूप मे समझते है।
प्रथम अध्याय- *अर्जुनविषादयोग* (सेना का निरीक्षण)
दुर्योधन ने अपने गुरु के पास जा कर कहा... हे आचार्य आपके बुद्धिमान शिष्य ध्रुपद पुत्र धृष्टद्युम्न के द्वारा व्यू  रचना से खड़ी हुई पांडवों की इस भारी भरकम सेना को देखिए। और सभी महारथियों का वर्णन किया। और उनकी तुलना मे अपने महापराक्रमी महारथियों के विषय मे बताया। 
तत्पश्चात पितामाह भीष्म ने अपना गंगनाभ: शंख बजाया। 
दूसरी और से श्रीकृष्ण ने अपना पाञ्चजन्य शंख बजाया। भगवान कृष्ण के शंखनाद के बाद सभी ने अपने अपने शंख भूके.
युधिष्ठिर ने -अनंतविजय, भीम ने-पौंड्र, अर्जुन ने-देवदत्त, सहदेव -मणिपुष्पक  नकुल ने -सुघोष, कर्ण ने हिरण्यगर्भ, और  दुर्योधन ने विदारक नमक शंख से भीषण शंखनाद किया। 
अर्जुन ने भगवान कृष्ण से कहा मेरा रथ दोनो सेनाओं के बीच ले चलो। युद्ध स्थल के बीच आ कर अर्जुन भगवान   कृष्ण के सम्मुख अपने निराशावादी व शोकयुक्त वचन रखते हुए बोलते है। 
हे माधव। मेरे सामने मेरे पितामाह खड़े है। जिनकी गोदी मे खेलकर मैं बड़ा हुआ हूँ। वो देखो मेरे गुरु द्रोण जिन्होंने कुछ शस्त्र विद्या दी है. गूरूपूत्र अश्वथामा, कुलगुरु कृपाचार्य,  दुर्योधन, समेत बड़ी माँ गांधारी के सभी पुत्र व अन्य सभी मेरे बंधु-बांधव है। मैं इन पर शस्त्र कैसे उठा सकता हूँ? इनको मारकर मैं विजय भी प्राप्त कर लेता हूँ तो भी मुझे पश्चाताप ही करना पड़ेगा। दोनो ओर मेरे अपने ही है। निराश हो कर अर्जुन रथ पर बैठ गए। अर्जुन का युद्ध उसके अपनों से ही था। परिवार का मोह उनको अपने कर्तव्य पथ से विमुख कर रहा था।


*शिक्षा* : कार्य के प्रारम्भ से पूर्व ही कार्य के विषय मे पूर्णतःआंकलन करना जरूरी होता है।  *शिक्षा* :सार्वजनिक निर्णय लेने के बाद कार्य से पीछे हटने से निन्दा व हंसी के पात्र हो सकते है। लोग कायर शब्द से भी सम्बोधित कर सकते है
*शिक्षा* :सफलता के लिए मोह का त्याग करना पड़ेगा। 
मोह किसी भी प्रकार का हो। चाहे रिश्तों, अपनों व  वस्तु के प्रति मोह हो सभी को त्यागना पड़ेगा।
 *उदहारण* : एक व्यक्ति का पुलिस मे सलेक्शन हो गया तो उसको परिवार के मोह को छोड़ ट्रेनिंग पर जाना होगा।
 *उदहारण* : किसी व्यक्ति को खेल जगत मे बड़ी उपलब्धि चाहिए तो उसको अपना आलस्य त्यागना होगा।  

किसी भी प्रकार का मोह व व्यर्थ का डर कर्तव्य से विमुख करता है।

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